शहीदों की शहादत -विपिन बकलोल
कभी आपने शहीदों की शहादत के बाद उनके घर पर हो रही मिडिया कवरेज को गौर से देखा है ? क्या आपने नोटिस किया कि घर के कोने में खड़ी चारपाई कितनी पुरानी हो चुकी है, क्या आपने ये जानने की कोशिश की जो शख्स देश की खातिर मिट्टी में लीन होने जा रहा है उसके घर की दीवार ना जाने कबसे पेंट भी नहीं हुई है क्योंकि की कई जवानों के घर तो मिटटी के ही दीखते हैं, हाँ उन दीवारों पर किये गए वादे जरुर दिख जाते हैं जो उस जवान ने किया था कि कुछ और साल में ये दीवारें ये मिटटी से ईंट की हो जाएँगी | कभी ध्यान दिया है उन रोते बिलखते बच्चों पर जो उन सपनों को लेकर रो रहे होते हैं जो उनके पापा ने अगली छुट्टी में आकर पूरा करने का वादा कर गये थे, गौर से देखिएगा उन बच्चों के कपड़ों को वो किसी शोपिंग माल से ख़रीदे नहीं लगते हैं, ना ही किसी बड़ी मॉडर्न फैशन की दूकान से, ये उन्ही दुकानों के लगते हैं जहाँ पर इस बात पर उधार मिल जाता है कि 'बेटा छुट्टी पर आएगा तो चुका देंगे' । कभी कैमरे के उस नज़र पर गौर कीजियेगा जो वो देखना और दिखाना नहीं चाहता है, जरा उस विधवा के तरफ ध्यान दीजियेगा जिसको इससे फर्क नहीं पड़ता कि उसे...